एसडीएफ न्यूज ब्यूरो,खगड़िया
जिले के संसापुर वार्ड-38 में सरकारी जमीन पर कथित अतिक्रमण का मामला अब स्थानीय विवाद से निकलकर प्रशासनिक और राजनीतिक मुद्दा बन गया है। सड़क, पोखर और स्वतंत्रता सेनानी ब्रह्मदेव चौधरी की स्मृति से जुड़ा यह प्रकरण क्षेत्र में चर्चा का मुख्य विषय बना हुआ है।
ग्रामीणों का आरोप है कि सरकारी अभिलेखों में दर्ज सड़क और जलस्रोत की जमीन पर वर्षों से कब्जा होता गया, जिससे रास्ता संकरा हो गया और पोखर का अस्तित्व कम होने लगा। लोगों का कहना है कि कई बार शिकायत देने के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई, जिसके बाद मामला जनता दरबार तक पहुंचा और अधिकारियों ने जांच के आदेश दिए।
प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार राजस्व अभिलेखों का मिलान किया जा रहा है तथा सीमांकन की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। अधिकारियों का कहना है कि नोटिस, सुनवाई और अंतिम आदेश की कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही आगे की कार्रवाई संभव होगी।
मामला तब और गंभीर हो गया जब विधायक विजय खेमका ने इसे विधानसभा में उठाया। उन्होंने सार्वजनिक जमीन से अतिक्रमण हटाने और स्वतंत्रता सेनानियों के सम्मान को सुनिश्चित करने की मांग की।
स्थानीय प्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को पत्र भेजकर हस्तक्षेप की अपील की है। पत्र में सड़क और पोखर को मूल स्वरूप में बहाल करने तथा सेनानी की स्मृति सुरक्षित रखने की मांग की गई है।ग्रामीणों के अनुसार विवादित सड़क वही मार्ग है जो स्वतंत्रता आंदोलन के समय सेनानी के घर तक जाता था। वहीं जिस स्थान पर कब्जे का आरोप है वहां पहले बड़ा पोखर हुआ करता था, जो सिंचाई और घरेलू उपयोग का मुख्य स्रोत था।
स्थानीय लोगों का कहना है कि रास्ता बाधित होने से बच्चों को स्कूल जाने में कठिनाई, बीमारों को अस्पताल पहुंचाने में देरी और किसानों को खेत तक वाहन ले जाने में परेशानी हो रही है। बरसात में जलजमाव की समस्या भी बढ़ जाती है।
प्रारंभिक जांच में नक्शे और वास्तविक स्थिति में अंतर सामने आने की बात कही जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि निगरानी की कमी और वर्षों की लापरवाही से सरकारी जमीन धीरे-धीरे निजी उपयोग में चली जाती है, जिससे ऐसे विवाद पैदा होते हैं।इस मुद्दे को लेकर आसपास के जिलों में भी चर्चा तेज हो गई है और कई सामाजिक संगठनों ने त्वरित कार्रवाई की मांग की है।
फिलहाल सबकी नजर प्रशासनिक जांच रिपोर्ट पर टिकी है।यदि समय पर निष्पक्ष कार्रवाई होती है तो यह मामला सार्वजनिक जमीन संरक्षण और ऐतिहासिक विरासत बचाने का उदाहरण बन सकता है।















