राजेश सिन्हा
खगड़िया की सरजमीं पर जब भानु प्रताप सिंह ने एसपी के तौर पर कमान संभाली, तो लगा था कि अब जुर्म का खात्मा तय है। पुलिस की गाड़ियां सड़कों पर दौड़ीं, ताबड़तोड़ छापेमारी हुई, सैकड़ों अभियुक्तों को जेल की सलाखों के पीछे धकेला गया, सालों से धूल फांक रही अपहरण की फाइलों से धूल हटी, और शराब से लेकर सूखे नशे तक के कारोबारियों पर पुलिस का चाबुक जमकर चला! शुरुआती कार्रवाइयों ने अपराधियों के दिल में खौफ पैदा किया, मीडिया में सुर्खियां बनीं, और आंकड़े देखकर लगा कि कानून का इकबाल बुलंद हो चुका है… लेकिन जैसे-जैसे वक्त बीता, इस कड़कती कार्रवाई की पूरी परतों के पीछे से एक खौफनाक और कड़वा सच निकलकर सामने आने लगा, जिसने खगड़िया पुलिस के दावों की धज्जियां उड़ाकर रख दी हैं!
सवाल सीधा और झकझोरने वाला है—अगर एसपी भानु प्रताप सिंह का चक्रव्यूह इतना ही अभेद्य और मजबूत है, तो फिर खगड़िया के अपराध जगत की ‘बड़ी मछलियां’ अब तक इस जाल से पूरी तरह सुरक्षित और दूर कैसे हैं? क्या एसपी साहब के नीचे काम करने वाले थानों और चौकियों के अधिकारियों ने अपनी नाकामी छुपाने के लिए सिर्फ कागजी आंकड़े चमकाने का खेल खेला है? क्या छोटे-छोटे नशेड़ियों और मामूली मोहरों को जेल भेजकर वाहवाही लूटी जा रही है, ताकि पर्दे के पीछे बैठकर करोड़ों का सिंडिकेट चलाने वाले बड़े कथित माफियाओं के काले व्यापार को सीधे तौर पर बचा लिया जाए?
यह कोई हवा-हवाई आरोप नहीं, बल्कि खगड़िया की फिजाओं में तैरते वे कड़वे सवाल हैं जिनका जवाब अब जनता खुलकर मांग रही है! बलुआही स्थित गांधी पार्क के समीप XUV-500 गाड़ी में आग लगने या फिर सोची-समझी साजिश के तहत आग लगाए जाने की खौफनाक वारदात को महीनों गुजर चुके हैं। तारीखें बदल गईं, लेकिन तफ्तीश की सुई आज भी वहीं अटकी हुई है। अगर इतनी बड़ी वारदात की सच्चाई महीनों बाद भी सामने नहीं आ सकी, तो यह मानने में हर्ज क्या है कि पुलिस की जांच की दिशा ही भटकी हुई है और असली कड़ियां किसी गहरे दबाव में जानबूझकर छुपाई जा रही हैं?
खगड़िया के बलुआही, मथुरापुर, रांको और आसपास के तमाम इलाकों की गलियों में चले जाइए—वहां के आम लोगों से लेकर बुजुर्गों तक की जुबान पर उन बड़े कथित कारोबारियों के नाम दर्ज हैं जो इस इलाके में नशे की खेप उतार रहे हैं। जब आम जनता को पता है कि शहर की रगों में जहर घोलने वाला असली आका कौन है, तो फिर आखिर पुलिस की तफ्तीश उन बड़े महलों और आलीशान ठिकानों तक पहुंचते-पहुंचते अचानक पस्त क्यों हो जाती है? यह सवाल किसी को बिना सबूत कसूरवार ठहराने का नहीं, बल्कि उन तमाम शिकायतों और जनभावनाओं की निष्पक्ष जांच का है, जिनका जवाब देना पुलिस की नैतिक जिम्मेदारी है।
कहीं ऐसा तो नहीं कि निचले स्तर के कुछ भ्रष्ट और सुस्त अधिकारियों की साठगांठ से छोटे खिलाड़ियों की बलि चढ़ाकर कार्रवाई का एक भव्य ‘ड्रामा’ रचा जा रहा है, ताकि असली नेटवर्क बिना किसी डर के अपना समानांतर साम्राज्य चलाता रहे? अगर पुलिस का दावा सच्चा है, तो फिर एसपी साहब का महकमा खुलकर सामने आए और बताए—यह नशे का माल किस बॉर्डर से खगड़िया में प्रवेश कर रहा है? इसकी सप्लाई लाइन का असली हेडक्वाटर कहां है? और इस पूरे काले कारोबार से पैदा होने वाला अकूत पैसा आखिर किस रसूखदार की तिजोरी तक पहुंच रहा है?
अपराध के खिलाफ असली जंग सिर्फ गिरफ्तारियों की संख्या बढ़ाकर नहीं, बल्कि जुर्म की जड़ पर हथौड़ा चलाकर जीती जाती है। एक-दो छोटी मछलियों को उठाकर सलाखों में ठूंस देने से पूरा तालाब कभी साफ नहीं होता; माफिया के पूरे सिंडिकेट को नेस्तनाबूद करना ही पुलिस की असली अग्निपरीक्षा है। एसपी भानु प्रताप सिंह की सख्त कार्यशैली पर लोगों को भरोसा है, लेकिन अब वक्त आ गया है कि वे अपने मातहत काम करने वाले पुलिस अधिकारियों की भूमिका का कड़ा ऑडिट करें, संदिग्ध अधिकारियों पर गाज गिराएं, और निचले तंत्र में बड़े पैमाने पर फेरबदल करके जवाबदेही तय करें।
खगड़िया की जनता अब खोखले दावों से ऊब चुकी है और सीधा जवाब चाहती है—आखिर छोटी मछलियां तो जाल में फंस गईं, लेकिन बड़ी मछली अब तक एसपी के जाल से बाहर क्यों तैर रही है? क्या पुलिस के बनाए इस सरकारी जाल में कोई जानबूझकर बनाया गया छेद है, या फिर जाल फेंकने वाले हाथ ही किसी अनदेखे दबाव में बड़ी मछली तक पहुंचने से पहले ठिठक कर रुक रहे हैं? सवाल बेहद गंभीर है, और अब इसका सीधा जवाब खगड़िया पुलिस को अपने काम से देना होगा!

राजेश सिन्हा
खगड़िया की सरजमीं पर जब भानु प्रताप सिंह ने एसपी के तौर पर कमान संभाली, तो लगा था कि अब जुर्म का खात्मा तय है। पुलिस की गाड़ियां सड़कों पर दौड़ीं, ताबड़तोड़ छापेमारी हुई, सैकड़ों अभियुक्तों को जेल की सलाखों के पीछे धकेला गया, सालों से धूल फांक रही अपहरण की फाइलों से धूल हटी, और शराब से लेकर सूखे नशे तक के कारोबारियों पर पुलिस का चाबुक जमकर चला! शुरुआती कार्रवाइयों ने अपराधियों के दिल में खौफ पैदा किया, मीडिया में सुर्खियां बनीं, और आंकड़े देखकर लगा कि कानून का इकबाल बुलंद हो चुका है… लेकिन जैसे-जैसे वक्त बीता, इस कड़कती कार्रवाई की पूरी परतों के पीछे से एक खौफनाक और कड़वा सच निकलकर सामने आने लगा, जिसने खगड़िया पुलिस के दावों की धज्जियां उड़ाकर रख दी हैं!









