राजेश सिन्हा की रिपोर्ट
खगड़िया:वैसे तो खगड़िया जिले के विभिन्न इलाकों में जमीन के नाम पर कई तरह से फर्जीवाड़ा किए गए है,लेकिन इसी खगड़िया के राजेंद्र नगर में जमीन अब सिर्फ खरीदी-बेची नहीं जा रही है,बल्कि “बनाई” भी जा रही है।जी हां,आपने सही सुना—बनाई जा रही है।कागज़ों में,फाइलों में,और सिस्टम की आंखों के सामने।मामला है खेसरा नंबर 447/1624, खाता 134 का, जिसे धड़ल्ले से बेचा गया।जबकि चौंकाने वाली बात ये है कि इससे संबंधित ऐसा कोई स्पष्ट और वैध दस्तावेज़ सरकारी अभिलेख में मौजूद ही नहीं है।अब सवाल उठता है कि,जब जमीन का अस्तित्व ही संदिग्ध है,तो आखिर रजिस्ट्री कैसे हो गई और हो रही है?नामांतरण कैसे पास हो गया?और सबसे बड़ा सवाल यह कि,लोगों की करोड़ों की गाढ़ी कमाई आखिर गई कहां?
बताया जा रहा है कि इस पूरे खेल में लगभग 35 से 40 करोड़ रुपये का लेन-देन हुआ है।यानी एक ऐसा घोटाला, जिसने न सिर्फ सिस्टम पर सवाल खड़े किए हैं,बल्कि आम लोगों की जिंदगी भर की जमा पूंजी को भी दांव पर लगा दिया है।
आरोप है कि एक बेहद छोटे भूखंड को आधार बनाकर उसे कई-कई हिस्सों में बांटा गया…6धुर, 8 धुर,10 धुर…और फिर उसी जमीन को बार-बार अलग-अलग लोगों को बेच दिया गया।यानी एक ही जमीन से कई बार पैसा निकाला गया।और ये सब हुआ सरकारी सिस्टम की नाक के नीचे।
राजस्व पदाधिकारी ने अपनी रिपोर्ट में जमीन को स्पष्ट मानने से इनकार किया… अभिलेखीय और स्थलीय जांच की जरुरत बतायी… लेकिन इसके बावजूद अंचलाधिकारी स्तर से नामांतरण को मंजूरी मिल गई।क्या ये महज लापरवाही है… या फिर एक सुनियोजित खेल?इस पूरे खेल में एक बुजुर्ग तथाकथित जमींदार सुरेन्द्र मोहन प्रसाद वर्मा का नाम सामने आता है… लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।परदे के पीछे बिचौलियों का नेटवर्क, गवाह के रूप में शामिल करीबी लोग,और पैसों का पूरा लेन-देन —सब कुछ एक चेन की तरह जुड़ा हुआ बताया जा रहा है।जमीन खरीदने वाले लोग कहते हैं कि उनका सीधा संपर्क असली विक्रेता से था ही नहीं… डील हुई बिचौलियों के जरिए पैसे दिए गए उनके हाथों… और कागज़ थमा दिए गए भरोसे के नाम पर।
इस पूरे मामले में रजिस्ट्री कार्यालय की भूमिका पर भी बड़ा सवाल खड़ा हो गया है।बताया जा रहा है कि जब इस पर सवाल किया गया तो रजिस्ट्रार का जवाब और भी चौंकाने वाला था—“मैं तो बस दुकानदार हूं… जमीन कोई भी रहे,लेने-बेचने वाले वैध हों या न हों,उससे क्या… मेरा काम है राजस्व लेना और सरकार को देना।”
अब सवाल यह है कि अगर जिम्मेदारी सिर्फ फीस लेने तक सीमित है,तो फिर सिस्टम में वैधता की जांच करेगा कौन?और अगर इसी तरह कागज़ी खेल चलता रहा और आगे चलकर इस विवाद में कोई हत्या,आत्महत्या या कोई जघन्य अपराध हो जाता है,तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?क्या सिर्फ उस बुजुर्ग व्यक्ति की,जिसका नाम कागज़ पर है?या उन बिचौलियों की, जिन्होंने पूरा खेल खड़ा किया?या फिर उस सिस्टम की,जिसने आंख मूंदकर सब कुछ होने दिया?सच यह भी है कि ऐसे ही दलालों और फर्जी जमीन मालिकों की वजह से खगड़िया में बार-बार जमीन को लेकर विवाद भड़कते हैं और कई बार ये विवाद खून-खराबे तक पहुंच जाते हैं।यानी कागज़ से शुरू हुआ खेल,जमीन पर जाकर “खूनी खेल” बन जाता है।
उधर, जिन लोगों ने 65 से 70 लाख रुपये प्रति कट्ठा के हिसाब से जमीन खरीदी…उनके सामने अब सिर्फ एक सवाल है—हमारा पैसा कौन लौटाएगा?विक्रेता?बिचौलिये?या फिर वो सिस्टम जिसने बिना पुख्ता रिकॉर्ड के सब कुछ मंजूर कर दिया?
कानूनी जानकारों की मानें तो अगर ये आरोप साबित होते हैं, तो ये सीधा-सीधा धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश का मामला बनता है, जिसमें न सिर्फ जेल,बल्कि संपत्ति कुर्क कर पैसे की वसूली तक हो सकती है।लेकिन जब तक जांच पूरी नहीं होती,तब तक खगड़िया में “जमीन की पैदावार” का ये खेल लोगों को डराता भी रहेगा और सवाल भी खड़े करता रहेगा—क्या अब जमीन खरीदना निवेश है… या सबसे बड़ा जोखिम?
बहरहाल,जमीन के नाम पर हुए कई फर्जीवाड़े के मामले इस बात की गवाही चीख-चीख दे रहे हैं कि,राजस्व कर्मचारी और अंचल स्तर से व्यापक पैमाने पर अनियमितता बरती गयी है।इस मामले का उद्भेदन होने के बाद विभिन्न मामलों का भी भंडाफोड़ धीरे-धीरे होना तय है।ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि,आगे-आगे होता है क्या??
क्रमशः
















